माँ! ( पुण्यतिथि पर )

माँ! (पुण्यतिथि पर)
माँ! (पुण्यतिथि पर)

नित्य 
सवेरे का 
सूर्य बन कर उदित होती है माँ!
करती है सकल विश्व को 
प्रकाशित अपने तेज़ से 
प्रकाश बन कर 
समा जाती है हृदय में,
साँझ होते-होते 
पहुँचती है पिता के पास,
कुछ क्षण विश्राम कर 
पिता से बतिया कर 
उभरती है पुनः नभ में 
चाँद बने पिता के साथ 
उनकी चाँदनी बन कर,
ताकि देख सकें हम 
एक-दूसरे को,
कह सकें अपने मन में 
समाया हर सुख-दुख,
इस तरह 
आज भी माँ! 
पिता के साथ 
रहती है सदा मेरे साथ 
कभी सूर्य तो कभी चाँद बन कर,
समाहित हो गई है 
प्रकृति के हर कण में,
माँ प्रकृति 
नित्य दुलराती है 
सिर सहलाती है 
आशीष लुटाती है 
जीने की आस जगाती है 
मेरे संग हँसती-गुनगुनाती है 
मुझसे नित बतियाती है।

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