हे ईश्वर!
बहुत दिनों से संवाद नहीं हुआ तुमसे!
यूँ तो हर पल 
संवाद चलता है तुमसे 
कुछ भी तो छिपा नहीं है 
सब प्रत्यक्ष है सामने तुम्हारे,
पर आज 
थोड़ा सा समय 
चुराया है अपनी 
दैनिक व्यस्तताओं से
कहने को मन की बातें!
तुम मुझे 
केवल शक्ति देना 
संघर्ष करते हुए 
अपना मार्ग स्वयं निर्मित करूँगी 
और लक्ष्य तक पहुँचूँगी।
इस यात्रा में 
विवेक धूमिल न होने देना 
कुंद पड़ने लगे तो 
धार तेज कर देना,
शक्ति देने का पात्र समझना 
पर दया का पात्र न समझना,
शक्ति संघर्ष में निखारेगी
पर तुम्हारी दया 
मेरे स्वाभिमान को चूर-चूर कर देगी,
हे ईश्वर!
मैं तुम्हारा अभिमान बनूँ 
और तुम मेरे स्वाभिमान के रक्षक!

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