एक वो समय था 
जब तुम्हारा हृदय 
मानवता से आप्लावित था 
सेवा भावना कृत्यों में 
छलकी पड़ती थी 
रोगी और परिजन 
तुम्हें ईश्वर का 
अवतार मान कर 
तुम्हारे हाथों में छोड़ 
निश्चिंत हो जाते थे 
और तुम भी मन-प्राणों से 
निरोग करने में 
अपनी नींद, चैन, भोजन तक 
भूल जाते थे 
निरोग हुआ रोगी और परिजन 
मन भर आशीष देते थे,
पर चिकित्सकों!
अब समय बदल गया है,
जीवन के चार वर्ष 
और उन चार वर्षों की 
पढ़ाई का मूल्य वसूलने में ही 
क्यों उलझ कर रह गए तुम!
किसी गरीब की निशुल्क चिकित्सा 
इतनी कठिन तो नहीं,
किसी को सही सुझाव देना 
इतना दुष्कर भी नहीं,
पर मोटी-मोटी फीस लेकर 
उन्हें तुम अपनी परिधि में 
झूठा आश्वासन दिए बांधे रखते हो 
परीक्षण के लिए भी 
वहीं भेजते हो 
जहाँ तुम्हारा हिस्सा 
मिलना निश्चित है,
चिकित्सकों!
अब तुमईश्वर का रूप नहीं 
कसाई और डाकू दिखते हो 
कि कोई रोगी आए तो 
बकरे की तरह हलाल करें 
या डाकू की तरह लूट लें,
कतराने लगा है रोगी 
तुम्हारे पास आने से 
डरने लगा है ऐलोपैथी दवाइयाँ लेने में,
तुमने अपना विश्वास खो 
दिया है चिकित्सकों!
पर इस घनघोर अंधेरे को चीर कर 
कुछ नये ऊर्जावान 
सेवाभावी उभर कर 
प्रकाश की किरण बन 
समाज में सेवा का जज्बा लिए 
आ रहे हैं 
जनमानस को 
खोया विश्वास लौटा रहे हैं
इसी से कहने को मन हो रहा है 
“हैपी डॉक्टर्स डे!”

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