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प्रधान सेवक – Dynamic Leader Shri Narendra Modi (Hindi Poem).

बने जब से 
अभिमान मेरे देश के 
संभाली बागडोर 
जब से भारत की 
प्रधान सेवक बन 
किए जितने भी काम 
खुले प्रगति के द्वार बहुत से 
विश्वास हो चला आम जन को 
कोई है जो सोचता/करता है 
उनके लिए हृदय से,
तभी तो अब वह 
नहीं आता किसी के 
बहकावे में,
सुनता/समझता है 
अपने मन से,
क्षेत्र कोई भी हो 
नहीं है अछूता अब प्रगति से,
नहीं हुआ पहले कभी ऐसा 
जो अब हो रहा है 
देश के प्रधान सेवक के साथ 
देश का हर छोटा/बड़ा 
महिलाएँ/बाल/युवा/ वृद्ध
स्वयं दायित्व ले 
अपना कर्तव्य-धर्म निबाहने को 
किसी के कहे बिना 
खड़ा हो रहा है,
सबका साथ, सबका विकास 
सबका विश्वास रंग ला रहा है 
मोदी जी के साथ पूरा देश 
विश्व पटल पर भारत को लाने के
भगीरथ प्रयास में 
सुर में सुर मिलाने जा रहा है।

माँ! ( पुण्यतिथि पर )

माँ! (पुण्यतिथि पर)
माँ! (पुण्यतिथि पर)

नित्य 
सवेरे का 
सूर्य बन कर उदित होती है माँ!
करती है सकल विश्व को 
प्रकाशित अपने तेज़ से 
प्रकाश बन कर 
समा जाती है हृदय में,
साँझ होते-होते 
पहुँचती है पिता के पास,
कुछ क्षण विश्राम कर 
पिता से बतिया कर 
उभरती है पुनः नभ में 
चाँद बने पिता के साथ 
उनकी चाँदनी बन कर,
ताकि देख सकें हम 
एक-दूसरे को,
कह सकें अपने मन में 
समाया हर सुख-दुख,
इस तरह 
आज भी माँ! 
पिता के साथ 
रहती है सदा मेरे साथ 
कभी सूर्य तो कभी चाँद बन कर,
समाहित हो गई है 
प्रकृति के हर कण में,
माँ प्रकृति 
नित्य दुलराती है 
सिर सहलाती है 
आशीष लुटाती है 
जीने की आस जगाती है 
मेरे संग हँसती-गुनगुनाती है 
मुझसे नित बतियाती है।

Happy Doctor’s day – शुभ चिकित्सक दिवस!

Happy Doctor's Day

एक वो समय था 
जब तुम्हारा हृदय 
मानवता से आप्लावित था 
सेवा भावना कृत्यों में 
छलकी पड़ती थी 
रोगी और परिजन 
तुम्हें ईश्वर का 
अवतार मान कर 
तुम्हारे हाथों में छोड़ 
निश्चिंत हो जाते थे 
और तुम भी मन-प्राणों से 
निरोग करने में 
अपनी नींद, चैन, भोजन तक 
भूल जाते थे 
निरोग हुआ रोगी और परिजन 
मन भर आशीष देते थे,
पर चिकित्सकों!
अब समय बदल गया है,
जीवन के चार वर्ष 
और उन चार वर्षों की 
पढ़ाई का मूल्य वसूलने में ही 
क्यों उलझ कर रह गए तुम!
किसी गरीब की निशुल्क चिकित्सा 
इतनी कठिन तो नहीं,
किसी को सही सुझाव देना 
इतना दुष्कर भी नहीं,
पर मोटी-मोटी फीस लेकर 
उन्हें तुम अपनी परिधि में 
झूठा आश्वासन दिए बांधे रखते हो 
परीक्षण के लिए भी 
वहीं भेजते हो 
जहाँ तुम्हारा हिस्सा 
मिलना निश्चित है,
चिकित्सकों!
अब तुमईश्वर का रूप नहीं 
कसाई और डाकू दिखते हो 
कि कोई रोगी आए तो 
बकरे की तरह हलाल करें 
या डाकू की तरह लूट लें,
कतराने लगा है रोगी 
तुम्हारे पास आने से 
डरने लगा है ऐलोपैथी दवाइयाँ लेने में,
तुमने अपना विश्वास खो 
दिया है चिकित्सकों!
पर इस घनघोर अंधेरे को चीर कर 
कुछ नये ऊर्जावान 
सेवाभावी उभर कर 
प्रकाश की किरण बन 
समाज में सेवा का जज्बा लिए 
आ रहे हैं 
जनमानस को 
खोया विश्वास लौटा रहे हैं
इसी से कहने को मन हो रहा है 
“हैपी डॉक्टर्स डे!”

हे ईश्वर!

हे ईश्वर!
हे ईश्वर!

हे ईश्वर!
बहुत दिनों से संवाद नहीं हुआ तुमसे!
यूँ तो हर पल 
संवाद चलता है तुमसे 
कुछ भी तो छिपा नहीं है 
सब प्रत्यक्ष है सामने तुम्हारे,
पर आज 
थोड़ा सा समय 
चुराया है अपनी 
दैनिक व्यस्तताओं से
कहने को मन की बातें!
तुम मुझे 
केवल शक्ति देना 
संघर्ष करते हुए 
अपना मार्ग स्वयं निर्मित करूँगी 
और लक्ष्य तक पहुँचूँगी।
इस यात्रा में 
विवेक धूमिल न होने देना 
कुंद पड़ने लगे तो 
धार तेज कर देना,
शक्ति देने का पात्र समझना 
पर दया का पात्र न समझना,
शक्ति संघर्ष में निखारेगी
पर तुम्हारी दया 
मेरे स्वाभिमान को चूर-चूर कर देगी,
हे ईश्वर!
मैं तुम्हारा अभिमान बनूँ 
और तुम मेरे स्वाभिमान के रक्षक!

कवि! – 5

कवि! 
तुम लिखना 
इसलिए मत छोड़ना 
कि नहीं की किसी ने 
तुम्हारी प्रशंसा,
तुम लिखना 
तब छोड़ना 
जब मन 
लिखने के लिए 
बिलकुल तैयार न हो।

कवि! – 4

कवि के लिए (कवि-4)

कवि!
जब लोग 
कहने लगें 
तुम्हारी कविता में 
दम नहीं है है 
तब समझ जाना 
तुम्हारे शब्द 
पैने, धारदार होकर 
लोगों के हृदय में उतर,
वार करने को तैयार हो गए हैं।

कवि! – 3

कवि के लिए (कवि-3)

कवि!
तुम अपने 
शब्दों को 
कसौटी पर 
इतना कसना 
कि जब हथियार की तरह 
उन्हें शत्रु पर चलाओ 
तो वह धराशायी हो जाए।

कवि! – 2

कवि के लिए (कवि - 2)

कवि! 
तुम लिखो 
लिखते रहो 
जरूरी नहीं ये 
कि समझ जाएँ 
आज ही 
लोग इसे,
तुम्हारे शब्द 
कई सदियों बाद 
प्रेरणादीप/ प्रकाश स्तम्भ बनेंगें
तुम केवल अपना 
कवि धर्म निभाना।

कवि! – 1

कवि के लिए (कवि - 1)

कवि!
जब भी कुछ कहो 
अपने मैं को 
दूर रखना,
जब भी कुछ लिखो 
स्वयं ही अपनी 
प्रशंसा न करना,
अनूठा आम जन के 
दिल/सुख को 
छू भी नहीं पाओगे 
और यह तुम्हारी हर होगी।

Maa Hindi Poem – माँ

माँ

पूरे घर का 
काम समेट कर 
थकान से चूर 
सुस्ताने को लेटी माँ 
बेटी के आते ही 
फुर्ती से रसोई में 
बेसन,सूजी ढूँढ 
पकौड़ी-हलवा 
बनाने लगती है!

सबके सामने 
चुप रहने वाली माँ 
बेटी के आते ही 
उसके सम्मुख अकेले में 
मुखर हो उठती है!

कुछ दिनों 
मायके में रहने 
आई बेटी को 
जाते समय माँ अपने लिए 
शौक से लाये 
साड़ी/सूट को 
“ये रंग तुझ पर ज्यादा खिलेगा”
कह कर, जबर्दस्ती बैग
में रखने लगती है!

अकेले होने पर 
अपनी पुरानी स्मृतियों में 
डूबने-उतराने के लिए 
अपनी माँ और पिता के 
लिखे पत्रों के पुलिंदे को 
जिसे रामचरितमानस
गीता से भी अधिक 
पवित्र मान सहेजे रखती है 
उसे खोल कर 
कोई पत्र निकाल कर 
पढ़ने लगती है माँ!
कोई आहट होते ही 
झट से समेट कर 
चेहरे पर हँसी ओढ़ लेती है!

बेटी के 
विवाह का एल्बम 
खोल कर बैठ जाती है 
मुद्रिका समारोह से 
देखना आरम्भ करती है
सगाई, महिला संगीत
बारात, वरमाला की तस्वीरें 
देखते हुए मुस्कराती रहती है,
फेरों की तस्वीरें देखते हुए 
गम्भीर होती जाती है,
आँखों में आँसू भर जाते हैं 
जो विदाई की तस्वीरों को 
देख ऐसे बहते हैं कि
रोके नहीं रुकते हैं!

धूप-छाँव सी 
होती है हर माँ!
अपने बच्चों के दुख में 
शीतल छाँव बन जाती है 
बच्चे अपना सुख-दुख 
उँडेल कर माँ के सम्मुख 
निश्चिंत हो जाते हैं!

सागर से अधिक 
गहरी माँ के हृदय की 
कोई थाह नहीं ले पाता,
सबके मन की 
समझने वाली के मन को 
कोई जान नहीं पाता!

स्नेह के दो बोलों से ही 
चल पड़ती है 
उसकी उदास दुनिया,
उन्हीं दो बोलों में ही 
पहुँच जाती है वो खुशी से 
सातवें आसमान पर!

बड़ी भोली 
बड़ी सलोनी 
ममतामयी होती है माँ!
बिन बोले, बिन कहे 
समझ जाती है 
बच्चों के मन की,
पर कह कर भी क्या 
कोई समझ पाता है 
माँ के मन की बात!
इसी से कभी-कभी 
होती है माँ उदास!