जब तक
पापा और माँ थे
तब तक
उनके ही इर्द-गिर्द
उनके ही आसपास
घूमती थी मेरी दुनिया,
और अब जब
वे निराकार हैं
तब भी मेरी दुनिया
उनके ही इर्द-गिर्द
उनके ही आसपास
वैसे ही घूम रही है,
कोई खुशी अपनी
सबसे पहले तुम्हें बता कर
आशीष भरा हाथ
सिर पर अनुभव करने को
मन करता है,
दुख की बदलियाँ
मन में समेटे हुए
तुम्हारे कंधे पर सिर रख
बरस कर रिक्त होने का
मन करता है,
जानती हूँ
तुम निराकार हो
मुझमें एकाकार हो गये हो
पर इस मन को कैसे समझाऊँ
जो हर जगह तुम्हें
और माँ को ढूँढता है!
चित्र में तुमसे संवाद कर
वहीं तुम्हारे सम्मुख बरस कर
बिलकुल तुम्हारी तरह
अपनी लड़ाई लड़ने को
तैयार होता है।
पर एक शिकायत
सदा रहेगी…
माँ और तुम!
इतनी जल्दी क्यों चले गए पापा……!!!

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