इस शहर की हवा बदल गई कुछ ऐसी
देखो तो अब लोग यहाँ रोज़ नहीं आते।
कितना मज़ा था पहले चाय-पकौड़ों में
जो अब पिज्ज़ा-बर्गर में भी नहीं पाते।
पैदल-साइकिलों पर सब आते थे घर में
अब गाड़ियाँ हैं, तब भी लोग नहीं आते।
मोबाइल,मॉल,होटल तक सीमित हो गए
हाय,हैलो से आगे शब्द कहे नहीं जाते।
शादी,किटी और मौत पर ही मिलते अब
ये न होते तो शायद मिल ही नहीं पाते।
मानवता होती है कितनी शर्मसार तब
जब गिरा हो कोई,और लोग चले जाते।
वक़्त भी कैसा बदल गया है देखो तो
बुज़ुर्ग भी देखो घर में नज़र नहीं आते।

कॉपीराइट@ डॉ.भारती वर्मा बौड़ाई

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here